बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

दादी मेरी


दादी मेरी

दादी मेरी दादी मेरी ।
बूढ़ी-सी है दादी मेरी ।
दादी के सफ़ेद बाल हैं
जो छुने में मखमल जैसा।
कंठी –माला है गले में
गिनती के दाँत बचे हैं ।
दूध रोटी खाती है दादी ।

मेरे उठने के पहले ही
पूजा- कर लेती है दादी।
भोग लगाती है गोपाल को
लड्डू रोज पाँच बेसन के ।
अदल-बदल कर मोटा चश्मा
पढ़ती है रामायण दादी ।
राम जब वन को जाते
कैकेयी को कोसती दादी।
पढ़ते –पढ़ते रामायण जब
दादी खाँसने लग जाती है
पीती है तब थोड़ा पानी
खाती है मीठी-छोटी गोली ।
होता है जब दर्द घुटने में
तेल मालिस कर लेती दादी।
होम –वर्क जब पूरा होता
भरथरी-चरित सुनाती दादी।
सुनने आतीं कुछ सहेली मेरी
जिनके नहीं होतीं है दादी ।


बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

पतंग

पतंग

नील गगन में
पतंग पवन की
बलखाती
इठलाती
कमर झुका कर
ताक-झांक कर
नाच रही थी
जी भर कर
जैसे पूरा
गगन बना हो
रंगमंच उसका ।

सह नहीं सकी
सहेली उसकी
लखन की हाथों
से फिसल कर
लग गयी गले
उसके जाकर।
मछ्ली दो
जरी थी
पंख में
बिना जल के
नाच रही थी।
धीमा था प्रकाश
सूरज का
हवा उन्हें
सहला रही थी।
देखा रंगमंच
बहुत बड़ा है
छिटक गयी
गले मिल कर
दूसरे छोर पर
उसके ।
जैसे एहसास दिलाया
अपने स्वतंत्र
होने  का ।

दूर से इतनी
पता नहीं
क्या
कहा-सुनी
हुई दोनों में ?
भिड़ गयी दोनों
होने लगी
गुथ्म-गुत्थी
जैसे दो हमजोली
लड़ती हैं
पकर- कर
झोंटा
एक- दूसरे का ।
देर हुई
नहीं  थी ज्यादा
पर थक
गयी थी
दोनों ।
लड़-झगड़ कर
जाकर बैठी
बूढ़े पीपल की
डाली पर
जैसे कराना
हो निपटारा
उसी बूढ़े से ।







                            



माँ का आशीर्वाद है यह ...


माँ का आशीर्वाद है यह ...

पूजा के दिन

देवी स्कंदमाता की
शुभ संवाद 
आया है ।
मिनी के 
पांचवें साल गिरह पर
स्कूल ने 
तोहफा भेजा है ...
है विनम्र
सुअनुशाषित ।
सह्रदय
संवेदनशील है ।
मदद के लिए 
किसी की
कक्षा में
पहला  हाथ 
उसका बढ़ता है ।
जांच-परख 
और
निगरानी कर
शिक्षकगण ने 
ऐसा ही 
खिताब भेजा है ।
आश्चर्यचकित हैं सब !
घर की मिनी
क्या स्कूल में   
ऐसी  है ?

कौन जान पाएगा

यदि माँ ने
आशीर्वाद दिए हों
चुपके –से ? 


गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013



बाल-वृन्द के लिए एक रचना:


लाल बहादुर शास्त्री के जन्म- दिवस पर यह रचना प्रस्तुत है


लाल बहादुर शास्त्री

लोभ नहीं था अपने पद का
धन –दौलत का लालच न था
कद तो छोटा –सा था उसका
पर दिल का बडा बहादुर था ।
न था अपना हाथी- घोड़ा
न  राजमहल  का प्राणी था
साधारण परिवार था उसका
शिक्षा –दीक्षा भी यहीं हुई
विद्यापीठ से पास किया था
डिग्री शास्त्री पाया था
स्वदेशी था धर्म उसका
भाई –चारा का हामी था
सादगी का जीवन जिआ
मितभाषी मितव्वयी था
धोती कुर्ता और सफेद टोपी
सादे लिवास का आदि था ।
देश –प्रेम से नाता जोडा
गांधी का   अनुयायी था ।
स्वाभिमान का पुतला था वह
भारत का मान बढ़ाया था
प्रधान –मंत्री था वह देश का
पर संतरी कहलाता था
जय जवान का नारा देकर
सैनिक को ललकारा था
नारा देकर जय किसान का
देश खुशहाल बनाया था ।
राजा राम तपस्वी था
यह सच कर दिखलाया था ।
नमन करो  ! नमन करो !     
इस युग पुरुष को !
इस युग में, अन्य कोई न आयेगा !