पतंग
नील गगन में
पतंग पवन की
बलखाती
इठलाती
कमर झुका कर
ताक-झांक कर
नाच रही थी
जी भर कर
जैसे पूरा
गगन बना हो
रंगमंच उसका ।
सह नहीं सकी
सहेली
उसकी
लखन
की हाथों
से
फिसल कर
लग
गयी गले
उसके
जाकर।
मछ्ली
दो
जरी
थी
पंख
में
बिना
जल के
नाच
रही थी।
धीमा
था प्रकाश
सूरज
का
हवा
उन्हें
सहला
रही थी।
देखा
रंगमंच
बहुत
बड़ा है
छिटक
गयी
गले
मिल कर
दूसरे
छोर पर
उसके
।
जैसे
एहसास दिलाया
अपने
स्वतंत्र
होने का ।
दूर
से इतनी
पता
नहीं
क्या
कहा-सुनी
हुई
दोनों में ?
भिड़
गयी दोनों
होने
लगी
गुथ्म-गुत्थी
जैसे
दो हमजोली
लड़ती
हैं
पकर-
कर
झोंटा
एक-
दूसरे का ।
देर
हुई
नहीं
थी ज्यादा
पर
थक
गयी
थी
दोनों
।
लड़-झगड़
कर
जाकर
बैठी
बूढ़े
पीपल की
डाली
पर
जैसे
कराना
हो
निपटारा
उसी
बूढ़े से ।
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