बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

दादी मेरी


दादी मेरी

दादी मेरी दादी मेरी ।
बूढ़ी-सी है दादी मेरी ।
दादी के सफ़ेद बाल हैं
जो छुने में मखमल जैसा।
कंठी –माला है गले में
गिनती के दाँत बचे हैं ।
दूध रोटी खाती है दादी ।

मेरे उठने के पहले ही
पूजा- कर लेती है दादी।
भोग लगाती है गोपाल को
लड्डू रोज पाँच बेसन के ।
अदल-बदल कर मोटा चश्मा
पढ़ती है रामायण दादी ।
राम जब वन को जाते
कैकेयी को कोसती दादी।
पढ़ते –पढ़ते रामायण जब
दादी खाँसने लग जाती है
पीती है तब थोड़ा पानी
खाती है मीठी-छोटी गोली ।
होता है जब दर्द घुटने में
तेल मालिस कर लेती दादी।
होम –वर्क जब पूरा होता
भरथरी-चरित सुनाती दादी।
सुनने आतीं कुछ सहेली मेरी
जिनके नहीं होतीं है दादी ।


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