शनिवार, 30 नवंबर 2013

बाल-वृंद के लिए एक रचना... चंचल मिश्रा ...प्रेमकुमार

बाल-वृंद के लिए एक रचना... चंचल मिश्रा ...प्रेमकुमार


चंचल मिश्रा
नाम है मेरा।
पतंग उड़ाना
काम है मेरा।
सीधा नहीं
मैं चलता हूँ ।
आड़े-तिरछे
चला करता हूँ।
जब सीढ़ी
चढ़ना होता है
दो को छोड़
तीसरे पर
पाँव रखता हूँ ।
नहीं दिन
ऐसा कोई होता
दो बार
जब सर
नहीं फूटता !
पर रोने का
नाम नहीं लेता ।
हँस-हँस कर
टाल देता हूँ ।
विडियो गेम
खेल लेता हूँ ।
कॉमिक्स भी
पढ़ लेता हूँ ।
नहीं रहते जब
पापा घर पर
कार्टून तब
देख लेता हूँ ।
होम वर्क पूरा
करता हूँ ।
पढ़ता कम हूँ
नंबर  तो
ज्यादा लाता हूँ ।
कहते मास्टर –
तेज और
सीधा –सादा है ।
पापा कहते-
बदमाश यह
बहुत बड़ा है ।
मम्मी ऐसा
कुछ नहीं कहती-
खाने में
बड़ा नखरा है-
यही शिकायत
रहती है उसकी ।
पढ़ाते रहते  
दादा हिन्दी।
दादी कहती-
होनहार है
पोता मेरा ।
सच में
क्या हूँ मैं
अब आप बताओ ?









बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

दादी मेरी


दादी मेरी

दादी मेरी दादी मेरी ।
बूढ़ी-सी है दादी मेरी ।
दादी के सफ़ेद बाल हैं
जो छुने में मखमल जैसा।
कंठी –माला है गले में
गिनती के दाँत बचे हैं ।
दूध रोटी खाती है दादी ।

मेरे उठने के पहले ही
पूजा- कर लेती है दादी।
भोग लगाती है गोपाल को
लड्डू रोज पाँच बेसन के ।
अदल-बदल कर मोटा चश्मा
पढ़ती है रामायण दादी ।
राम जब वन को जाते
कैकेयी को कोसती दादी।
पढ़ते –पढ़ते रामायण जब
दादी खाँसने लग जाती है
पीती है तब थोड़ा पानी
खाती है मीठी-छोटी गोली ।
होता है जब दर्द घुटने में
तेल मालिस कर लेती दादी।
होम –वर्क जब पूरा होता
भरथरी-चरित सुनाती दादी।
सुनने आतीं कुछ सहेली मेरी
जिनके नहीं होतीं है दादी ।


बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

पतंग

पतंग

नील गगन में
पतंग पवन की
बलखाती
इठलाती
कमर झुका कर
ताक-झांक कर
नाच रही थी
जी भर कर
जैसे पूरा
गगन बना हो
रंगमंच उसका ।

सह नहीं सकी
सहेली उसकी
लखन की हाथों
से फिसल कर
लग गयी गले
उसके जाकर।
मछ्ली दो
जरी थी
पंख में
बिना जल के
नाच रही थी।
धीमा था प्रकाश
सूरज का
हवा उन्हें
सहला रही थी।
देखा रंगमंच
बहुत बड़ा है
छिटक गयी
गले मिल कर
दूसरे छोर पर
उसके ।
जैसे एहसास दिलाया
अपने स्वतंत्र
होने  का ।

दूर से इतनी
पता नहीं
क्या
कहा-सुनी
हुई दोनों में ?
भिड़ गयी दोनों
होने लगी
गुथ्म-गुत्थी
जैसे दो हमजोली
लड़ती हैं
पकर- कर
झोंटा
एक- दूसरे का ।
देर हुई
नहीं  थी ज्यादा
पर थक
गयी थी
दोनों ।
लड़-झगड़ कर
जाकर बैठी
बूढ़े पीपल की
डाली पर
जैसे कराना
हो निपटारा
उसी बूढ़े से ।







                            



माँ का आशीर्वाद है यह ...


माँ का आशीर्वाद है यह ...

पूजा के दिन

देवी स्कंदमाता की
शुभ संवाद 
आया है ।
मिनी के 
पांचवें साल गिरह पर
स्कूल ने 
तोहफा भेजा है ...
है विनम्र
सुअनुशाषित ।
सह्रदय
संवेदनशील है ।
मदद के लिए 
किसी की
कक्षा में
पहला  हाथ 
उसका बढ़ता है ।
जांच-परख 
और
निगरानी कर
शिक्षकगण ने 
ऐसा ही 
खिताब भेजा है ।
आश्चर्यचकित हैं सब !
घर की मिनी
क्या स्कूल में   
ऐसी  है ?

कौन जान पाएगा

यदि माँ ने
आशीर्वाद दिए हों
चुपके –से ? 


गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013



बाल-वृन्द के लिए एक रचना:


लाल बहादुर शास्त्री के जन्म- दिवस पर यह रचना प्रस्तुत है


लाल बहादुर शास्त्री

लोभ नहीं था अपने पद का
धन –दौलत का लालच न था
कद तो छोटा –सा था उसका
पर दिल का बडा बहादुर था ।
न था अपना हाथी- घोड़ा
न  राजमहल  का प्राणी था
साधारण परिवार था उसका
शिक्षा –दीक्षा भी यहीं हुई
विद्यापीठ से पास किया था
डिग्री शास्त्री पाया था
स्वदेशी था धर्म उसका
भाई –चारा का हामी था
सादगी का जीवन जिआ
मितभाषी मितव्वयी था
धोती कुर्ता और सफेद टोपी
सादे लिवास का आदि था ।
देश –प्रेम से नाता जोडा
गांधी का   अनुयायी था ।
स्वाभिमान का पुतला था वह
भारत का मान बढ़ाया था
प्रधान –मंत्री था वह देश का
पर संतरी कहलाता था
जय जवान का नारा देकर
सैनिक को ललकारा था
नारा देकर जय किसान का
देश खुशहाल बनाया था ।
राजा राम तपस्वी था
यह सच कर दिखलाया था ।
नमन करो  ! नमन करो !     
इस युग पुरुष को !
इस युग में, अन्य कोई न आयेगा !







शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

बाल-वृन्द के लिए यह एक रचना : समय (प्रेमकुमार)




               
समय


कहता है क्या समय ?
सुन लो तुम जरा-सा।
स    साथ दूंगा
म    मैं तुम्हारा
य    यदि कहा
मानोगे मेरा ।
सोच-समझ कर
काम करो तुम
साथ दूंगा सदा
तुम्हारा ।
देखो सूरज
सुबह उगता है
शाम हुई तो
ढल जाता है ।
अपने नियम के
अनुसार ही
चाँद अपने
रूप सवांरता ।
हवा निरंतर
बहती रहती
लहरें नहीं
कभी रुकती है ।
पल सेकंड
मिनट घंटे
दिन सप्ताह
और पखवारे
मास वर्ष
और शताब्दी में
रखते हैं सब
हिसाब हमारा ।
पर मैं कभी
नहीं रुकता हूँ
रुकती नहीं जैसे
सांस तुम्हारी ।
जो मेरे साथ चले
साथी हूँ
मैं उसका ।
सपने उसके
साकार करूंगा
साथ-साथ जो
चलेगा मेरे ।







गुरुवार, 19 सितंबर 2013

गाँव में ईद

(13)


गाँव में ईद


कूकड़ूँ – कूँ
कूकड़ूँ – कूँ
मुर्गे ने बांग दी।
चीं चीं
फुदकी
चिड़ियाँ
चह चहचाही।
गुटरूँ-गुटरूँ
पड्रोसी की कबूतरी बोली।
सब सुन कर
पंडित जी की गाय
भी रंभाई।
तब दूर-दराज की मस्जिद का
मौलवी क्यों सोता?
पाक-साफ होकर
लौड्स्पीकर से ---
उसने भी चेताया---
हड्बड़ा कर उठे
तब छोटे मियां।---
अब्बू दे चुके थे दाना
मुर्गा-मुर्गी को ।
पंडित जी की गाय
खा रही थी सानी ।
पड्रोसी की कबूतरी
चुग रही थी दाना ।
और अम्मीजान ने
बना लिया था ईद का पूरा खाना
गोस्त-कबाब और कई तरह की
सेवइयाँ ।
छोटे मियां  का जी ललचाया---
अपने को फिर समझाया---
पहले तैयार होना है
नए-नए कपड़े और
जाली वाली टोपी
पहन कर
अब्बू के साथ नमाज पढ़ना है।
दोस्तों से गले मिल कर
मुबारकवाद लेना-देना है
नाना –नानी,दादा-दादी
और चाचू से ईदी लेना है---
तब  कभी  खाना-पीना है।
बारह तो बज ही जाएंगे ।
और पंडित के लड़के
रामनरेश को
सांझ ढले तो
छुप-छुपाके
सेवइयाँ खिलाना है 


बाघ को गुस्सा क्यों आता है ?

(12)
बाघ को गुस्सा क्यों आता है ?


• घनी रात में
• बीहड़ वन में
• दबे पावों
• जब कोई आता
• टीन बजा कर
• आग सुलगा कर
• रोशनी का
• जब  जाल बिछाता
• बिना खौफ़ के
• जल्दी-जल्दी
• छोटे –बड़े
• इन पेड़ों को
• लगता काटने।
• गुस्सा आता है तब
• बाघ को ।

• दूर- दराज से
• लौटती चिड़ियाँ
• पाती नहीं
• अपना घोंसला
• दर्द भरी
• चीं-चीं सुन कर
• दिल पिघलता है
• जब उसका
• गुस्सा तब आता है बाघ को।

• जब बोलती
• बेवश होकर
• हिरणी की माता
• गोली मारा
• मेरी बेटी को
• और उठा ले गए
• उसकी मुंह-बोली
• बहन शीतली’ को
• मैं बच गयी
• नहीं तो अनाथ
• हो जाता  बबुआ ।,
• गाड़ी में भर कर
• आए थे नवजवान
• शहर के ।
• और कर गए
• यह उपकार हमारा ।
• आँखों में थे आँसू
• पर गुस्सा आया  तब बाघ को ।

• कटते जाते पेंड यहाँ से
• वन-रक्षक की मिली-भगत से
• नदी-नालों पर पुल बन गए ।
• आवाजाही शुरू हो गयी
• सुरसा की तरह शहर फैल गया
• बचा-खुचा  जंगल है अब तो
• सदियों का यह  ठौर- ठिकाना
• उजड-रहा है –उजड़ रहा है
•  यही-देख कर गुस्सा आता है बाघ को
• शेर ने बहुत समझाया
• गुस्सा करना बहुत बुरा है
• जितना जंगल बचा हुआ है
• उसमें  ही  मरना-खपना है
•  समय बदल गया है
• रहा नहीं अब जंगल अपना ।
• न रहा मैं अब जंगल का राजा ।
• बूढ़े शेर की बात
• बाघ समझ नहीं पाता
• इसीलिए तो आता है गुस्सा !






वह है हीरा !




(11)

वह है हीरा !
 


वह है हीरा !
ईश्वर का उपहार है हीरा ।
इन्द्र्देव की श्रीष्टि  हीरा।
वज्र उनका था तो हीरा ।
देवों का आसूं है हीरा ।
कामदेव का तीर नुकीला
और उसमें जड़ा था हीरा ।
ग्रीक की धारणा है यह
टूटे तारों से ढला है हीरा ।
बौद्ध-भिक्षुओं की
किवदंती -
एक  राजा  की
बलि हुई थी और
उनकी जली हड्डियों से
बना था हीरा ।
इन बातों को
छोड़ो- छोड़ो
ऐसा कोई प्रमाण नहीं है।
 
अरबों-खरबों सालों पहले
प्रलय की किसी घड़ी में
पेड़-पौधे  और
जल - थल के 
जीव-जन्तु सब
समा गए थे पाताल-लोक में।
और अग्नि की  भीषण  ज्वाला से
बनते गए काले- कोयले ।
फिर कोई भाग्यशाली कोयला
कैसे बना हीरा का टुकड़ा
यह   कहना मुश्किल है भाई ।
भूगर्भ –शास्त्र जब पढ़ोगे
तब खुलेगा  यह रहस्य निराला।
अभी तो मानो
कार्बन है यह हीरा।



पर हीरा  का अरमान बड़ा है
अभिमानी है , कठोर बहुत है
जब से आया
सदियाँ बीती
सबने उसका मान बढ़ाया
सतयुग –त्रेता और द्वापर
हर युग में अनमोल रहा है
क्या कारण है ?
द्वारकाधीश ने
युद्ध में क्यों  जीता था हीरा। 
पर वे भी  न रख पाये
चुरा लिया था उनसे  भी  हीरा।
ऐसे में फिर क्यों न बढ़ता
शान हीरा का।
ऐसे में फिर क्यों न ढूँढे
लिखित इतिहास हीरे का।
लेखा-जोखा करके देखा
चार हजार साल
पुराना है
इतिहास हीरे का ।
महान देश है हमारा
जिसने दिखाया दुनिया को पहला हीरा
गोलकुंडा की शाख बढ़ गयी
भारत की धाक जाम गयी
ढूँढने लगे सब
अपने-अपने देशों मे
 उज्जवल और  शाश्वत  हीरा