गुरुवार, 19 सितंबर 2013

गाँव में ईद

(13)


गाँव में ईद


कूकड़ूँ – कूँ
कूकड़ूँ – कूँ
मुर्गे ने बांग दी।
चीं चीं
फुदकी
चिड़ियाँ
चह चहचाही।
गुटरूँ-गुटरूँ
पड्रोसी की कबूतरी बोली।
सब सुन कर
पंडित जी की गाय
भी रंभाई।
तब दूर-दराज की मस्जिद का
मौलवी क्यों सोता?
पाक-साफ होकर
लौड्स्पीकर से ---
उसने भी चेताया---
हड्बड़ा कर उठे
तब छोटे मियां।---
अब्बू दे चुके थे दाना
मुर्गा-मुर्गी को ।
पंडित जी की गाय
खा रही थी सानी ।
पड्रोसी की कबूतरी
चुग रही थी दाना ।
और अम्मीजान ने
बना लिया था ईद का पूरा खाना
गोस्त-कबाब और कई तरह की
सेवइयाँ ।
छोटे मियां  का जी ललचाया---
अपने को फिर समझाया---
पहले तैयार होना है
नए-नए कपड़े और
जाली वाली टोपी
पहन कर
अब्बू के साथ नमाज पढ़ना है।
दोस्तों से गले मिल कर
मुबारकवाद लेना-देना है
नाना –नानी,दादा-दादी
और चाचू से ईदी लेना है---
तब  कभी  खाना-पीना है।
बारह तो बज ही जाएंगे ।
और पंडित के लड़के
रामनरेश को
सांझ ढले तो
छुप-छुपाके
सेवइयाँ खिलाना है 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें