शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

बाल-वृन्द के लिए यह एक रचना : समय (प्रेमकुमार)




               
समय


कहता है क्या समय ?
सुन लो तुम जरा-सा।
स    साथ दूंगा
म    मैं तुम्हारा
य    यदि कहा
मानोगे मेरा ।
सोच-समझ कर
काम करो तुम
साथ दूंगा सदा
तुम्हारा ।
देखो सूरज
सुबह उगता है
शाम हुई तो
ढल जाता है ।
अपने नियम के
अनुसार ही
चाँद अपने
रूप सवांरता ।
हवा निरंतर
बहती रहती
लहरें नहीं
कभी रुकती है ।
पल सेकंड
मिनट घंटे
दिन सप्ताह
और पखवारे
मास वर्ष
और शताब्दी में
रखते हैं सब
हिसाब हमारा ।
पर मैं कभी
नहीं रुकता हूँ
रुकती नहीं जैसे
सांस तुम्हारी ।
जो मेरे साथ चले
साथी हूँ
मैं उसका ।
सपने उसके
साकार करूंगा
साथ-साथ जो
चलेगा मेरे ।







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