गुरुवार, 19 सितंबर 2013

गिनती

 
(10) 
 
•गिनती

एक ईश्वर
एक ख़ुदा
और एक जीसस 
सूरज एक
चाँद एक
और एक आसमान ।
जगत का श्रीष्टिकर्ता -
ब्रह्मा  एक है।

एक के बाद
आया दो ।
शिव-पार्वती
गणेश- लक्ष्मी
राधा – कृष्ण
क्या नहीं हैं दो ?
तीन बीच में बोल पड़ा
तीन देव हैं-
ब्रह्मा-विष्णु -महेश
और त्रिनेत्र हैं
देवों के देव महादेव।
बेलपत्र में तीन पात हैं
जिससे पूजे जाते शिव ।

चार था गुमसुम
बोला उसने-
ब्रह्मा जी के चार मुख
चार भुजाएँ लक्ष्मी-सरस्वती की ।
चार वेद हैं वेदव्यास के ।
चार दिशाओं से आतीं है
जीवनदायनी मंद हवाएँ ।

पाँच का तो बड़ा भाग्य है
पंचमुखी हनुमान हैं
पंचामृत ही महा प्रसाद है
पाँच तत्व से  निर्मित काया
पञ्च -तत्व मैं विलीन होती है ।

अब छ्ह कि बारी आई –
वह निराश क्यों कर होगा?
छ्ह ऋतुयों से सजती धरती ।
छठ तो महान पर्व है
सूर्यदेव की होती पूजा ।

सात है कला का प्रेमी
इंद्र्धनुष के सात रंगों में
घुला-मिला है ।
नारद की वीणा से निकला
सप्त स्वर है ।
और है दिवस सात ।

आठ तो पूजनीय है ।
अष्टमी के दिन
कृष्ण - जन्म का
उत्सव   होता 
जन्माष्टमी महापर्व है ।
माँ दुर्गा की आठ भुजाएँ
सजती है अस्त्र-शस्त्र से ।

नवमी के दिन
हुये प्रभु प्रगट  कृपाला ।             
नव ग्रह की पूजा होती ।
नव कलश सजते
नवरस है जीवन के ।

दसमी तो विजयादशमी है ।
दशानन का वध हुआ था ।
अनाचार का अंत हुआ था ।
यों  दस -
दो अंकों का जोड़ा
एक के बारे में जाना
और शून्य -
दर्शनशास्त्र का अभिन्न अंग है।
जीवन शून्य है ...
शून्य दिया भारत ने
विश्व को अनूठा  उपहार ।






कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें